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sarveshwar dayal saxena hindi kavita koi mere sath chale

इरशाद

मैंने कब कहा कोई मेरे साथ चले चाहा ज़रूर - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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मैंने कब कहा
कोई मेरे साथ चले
चाहा ज़रूर!

अक्सर दरख़्तों के लिये
जूते सिलवा लाया
और उनके पास खड़ा रहा
वे अपनी हरियाली
अपने फूल फूल पर इतराते
अपनी चिड़ियों में उलझे रहे

मैं आगे बढ़ गया
अपने पैरों को
उनकी तरह
जड़ों में नहीं बदल पाया

यह जानते हुए भी
कि आगे बढ़ना
निरंतर कुछ खोते जाना
और अकेले होते जाना है
मैं यहां तक आ गया हूं
जहां दरख्तों की लंबी छायाएं
मुझे घेरे हुए हैं......

किसी साथ के
या डूबते सूरज के कारण
मुझे नहीं मालूम
मुझे
और आगे जाना है
कोई मेरे साथ चले
मैंने कब कहा
चाहा ज़रूर!

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