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इरशाद

ग़ज़ल

Sanjay Yadav

5 कविताएं

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घर की बात घर में ही रहने दो ,यूं सरे बाज़ार ना करो ,
पारिवारिक झगड़े हैं! मिल बैठ के सुलझाओ ,यूं हल्ला करके इन्हें सुबह का अख़बार ना करो ।

करुणा, स्नेह ,परोपकार ,आदर भाव सर्वोच्य गुण इंसान के ,
सरेआम किसी बेज़ुबान को यूं मारकर इंसानियत को शर्मसार ना करो ।

बाज़ुओं में मिला है जो बल इस्तेमाल उसका , किसी अबला की सुरक्षा या निर्बल को उठाने में करो,
करके निर्बल या नारी पे अत्याचार पौरूषत्व को दाग़दार ना करो ।

भौतिकवादी युग में भौतिक होना अच्छा है , इतना भी नहीं मगर ,
देखते ही भोग ललचा जाओ, ख़ुद को इतना भी लाचार ना करो ।

बनने को धनवान बेच डाली तुमने शर्म ,बेच डाला आत्मसम्मान
अब तो रुको ! कम से कम अब ज़मीर का तो व्यापार ना करो ।

-डाक्टर धनंजय यादव

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