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sahir ludhianvi nazm khoon apna ho ya paraya ho

इरशाद

साहिर की नज़्म से दुनिया को संदेश… ख़ून अपना हो या पराया हो नस्ल-ए-आदम का ख़ूं है आख़िर

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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ख़ून अपना हो या पराया हो
नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िर
जंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब में
अम्न-ए-आलम का ख़ून है आख़िर

बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूह-ए-तामीर ज़ख़्म खाती है
खेत अपने जलें कि औरों के
ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है
टैंक आगे बढ़ें कि पिछे हटें
कोख धरती की बाँझ होती है
फ़त्ह का जश्न हो कि हार का सोग
ज़िंदगी मय्यतों पे रोती है

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