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Sahir ludhianvi ghazal kabhi khud pe kabhi halat pe roya aaya

इरशाद

कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया - साहिर लुधियानवी

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया

हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को
क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया

किस लिए जीते हैं हम किस के लिए जीते हैं
बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया

कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया

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