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ब्रज का काव्य: मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन...

रसखान
                
                                                                                 
                            मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
                                                                                                

जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥

या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
रसखान कबौं इन आँखिन सों, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥ आगे पढ़ें

ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै...

3 years ago

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