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राहत इंदौरी की मशहूर ग़ज़ल: उसकी कत्थई आंखों में हैं जंतर मंतर सब

इरशाद

राहत इंदौरी की मशहूर ग़ज़ल: उसकी कत्थई आंखों में हैं जंतर मंतर सब

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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उसकी कत्थई आँखों में हैं जंतर-मंतर सब
चाक़ू-वाक़ू, छुरियाँ-वुरियाँ, ख़ंजर-वंजर सब

जिस दिन से तुम रूठीं मुझ से रूठे-रूठे हैं
चादर-वादर, तकिया-वकिया, बिस्तर-विस्तर सब

मुझसे बिछड़ कर वह भी कहाँ अब पहले जैसी है
फीके पड़ गए कपड़े-वपड़े, ज़ेवर-वेवर सब

आखिर मैं किस दिन डूबूँगा फ़िक्रें करते हैं
कश्ती-वश्ती, दरिया-वरिया लंगर-वंगर सब
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