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राहत इंदौरी की मशहूर ग़ज़ल: कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए

इरशाद

राहत इंदौरी की मशहूर ग़ज़ल: कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए 

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए 
कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए 

सूरज से जंग जीतने निकले थे बेवक़ूफ़ 
सारे सिपाही मोम के थे घुल के आ गए 

मस्जिद में दूर दूर कोई दूसरा न था 
हम आज अपने आप से मिल-जुल के आ गए 

नींदों से जंग होती रहेगी तमाम उम्र 
आँखों में बंद ख़्वाब अगर खुल के आ गए 

सूरज ने अपनी शक्ल भी देखी थी पहली बार 
आईने को मज़े भी तक़ाबुल के आ गए 

अनजाने साए फिरने लगे हैं इधर उधर 
मौसम हमारे शहर में काबुल के आ गए 
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