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रघुवीर सहाय

इरशाद

उसको कितना होश था और मुझको कितना था सरूर : रघुवीर सहाय 

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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मैं नशे में धुत था आधी रात के सुनसान में 
एक कविता बोलता जाता था अपनी जान में 

कुछ मिनट पहले किए थे बिल पे मैंने दस्तख़त
ख़ानसामा सोचता होगा कि यह सब है मुफ़्त

तुम जो चाहो खा लो पी लो और यह सिगरेट लो 
सुन के मुझको देखता था वह कि अपने पेट को?
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फिर कहा रख कर के सिगरेट

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