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क़तील शिफ़ाई की नज़्म: रौशनी डूब गई चाँद ने मुँह ढाँप लिया

इरशाद

क़तील शिफ़ाई की नज़्म: रौशनी डूब गई चाँद ने मुँह ढाँप लिया

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

रौशनी डूब गई चाँद ने मुँह ढाँप लिया 
अब कोई राह दिखाई नहीं देती मुझ को 
मेरे एहसास में कोहराम मचा है लेकिन 
कोई आवाज़ सुनाई नहीं देती मुझ को 

रात के हाथ ने किरनों का गला घूँट दिया 
जैसे हो जाए ज़मीं-बोस शिवाला कोई 
ये घटा-टोप अँधेरा ये घना सन्नाटा 
अब कोई गीत है बाक़ी न उजाला कोई आगे पढ़ें

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