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कैलाश गौतम

इरशाद

कचहरी वकीलों की थाली है बेटे, पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे...

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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भले डांट घर में तू बीबी की खाना
भले जैसे -तैसे गिरस्ती चलाना
भले जा के जंगल में धूनी रमाना
मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
कचहरी न जाना
कचहरी न जाना

कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
अहलमद से भी कोरी यारी नहीं है
तिवारी था पहले तिवारी नहीं है आगे पढ़ें

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