हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा: परवीन शाकिर

परवीन शाकिर
                                वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा 
मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा 

हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा 
क्या ख़बर थी कि रग-ए-जाँ में उतर जाएगा 

वो हवाओं की तरह ख़ाना-ब-जाँ फिरता है 
एक झोंका है जो आएगा गुज़र जाएगा 

वो जब आएगा तो फिर उस की रिफ़ाक़त के लिए 
मौसम-ए-गुल मिरे आँगन में ठहर जाएगा  आगे पढ़ें

3 days ago
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