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जिगर मुरादाबादी

इरशाद

'जिगर' मुरादाबादी : निगाहों से निगाहें लड़ रही हैं, मजे़ दर्दे-मुहब्बत पा रहा है

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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तड़प करके उन्हें तड़पा रहे हैं 
क़यामत पे क़यामत ढा रहे हैं 

अजब आलम सा दिल पे छा रहा है 
हसीं जैसे कोई शरमा रहा है 

निगाहों से निगाहें लड़ रही हैं 
मजे़ दर्दे-मुहब्बत पा रहा है

पयामे शौक का अब पूछना क्या 
बराबर आ रहा है जा रहा है 

गले मिलकर वो रुख़सत हो रहे हैं 
मुहब्बत का ज़माना आ रहा है 

वो कुछ दिल को मेरे समझा रहे हैं 
कुछ उनको दिल मेरा समझा रहा है 

- 'जिगर' मुरादाबादी 
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