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Nirmala putul poetry boodhi prathvi ka dukh

इरशाद

निर्मला पुतुल की करुण कविता ‘बूढ़ी पृथ्वी का दुख’

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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क्या तुमने कभी सुना है
सपनों में चमकती कुल्हाड़ियों के भय से
पेड़ों की चीत्कार?

कुल्हाड़ियों के वार सहते
किसी पेड़ की हिलती टहनियों में
दिखाई पड़े हैं तुम्हें
बचाव के लिए पुकारते हज़ारों-हज़ार हाथ?

क्या होती है, तुम्हारे भीतर धमस
कटकर गिरता है जब कोई पेड़ धरती पर?

सुना है कभी
रात के सन्नाटे में अंधेेरे से मुंह ढांप
किस कदर रोती हैं नदियां

इस घाट अपने कपड़े और मवेशियां धोते
सोचा है कभी कि उस घाट
पी रहा होगा कोई प्यासा पानी
या कोई स्त्री चढ़ा रही होगी किसी देवता को अर्घ्य?

कभी महसूस किया कि किस कदर दहलता है
मौन समाधि लिए बैठा पहाड़ का सीना
विस्फोट से टूटकर जब छिटकता दूर तक कोई पत्थर?
सुनाई पड़ती है कभी भरी दुपहरिया में
हथौड़ों की चोट से टूटकर बिखरते पत्थरों की चीख

खून की उल्टियां करते
देखा है कभी हवा को, अपने घर के पिछवाड़े?
थोड़ा-सा वक़्त चुराकर बतियाता है कभी
कभी शिकायत न करने वाली
गुमसुम बूढ़ी पृथ्वी से उसका दुख?

अगर नहीं, तो क्षमा करना!
मुझे तुम्हारे आदमी होने पर सन्देह है

साभार- नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द
भारतीय ज्ञानपीठ

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