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Nida fazli ghazal kuch bhi na bacha kahne ko

इरशाद

कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई - निदा फ़ाज़ली

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई
आओ कहीं शराब पिएं रात हो गई

फिर यूं हुआ कि वक़्त का पांसा पलट गया
उम्मीद जीत की थी मगर मात हो गई

सूरज को चोंच में लिए मुर्ग़ा खड़ा रहा
खिड़की के पर्दे खींच दिए रात हो गई

वो आदमी था कितना भला कितना पुर-ख़ुलूस
उस से भी आज लीजे मुलाक़ात हो गई

रस्ते में वो मिला था मैं बच कर गुज़र गया
उस की फटी क़मीस मिरे साथ हो गई

नक़्शा उठा के कोई नया शहर ढूंढिए
इस शहर में तो सब से मुलाक़ात हो गई

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