नासिर काज़मी: फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आए 

Ghazal
                
                                                             
                            फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आए 
                                                                     
                            
फिर पत्तों की पाज़ेब बजी तुम याद आए 

फिर कूजें बोलीं घास के हरे समुंदर में 
रुत आई पीले फूलों की तुम याद आए 

फिर कागा बोला घर के सूने आँगन में 
फिर अमृत रस की बूँद पड़ी तुम याद आए 

पहले तो मैं चीख़ के रोया और फिर हँसने लगा 
बादल गरजा बिजली चमकी तुम याद आए 

दिन भर तो मैं दुनिया के धंदों में खोया रहा 
जब दीवारों से धूप ढली तुम याद आए 
3 years ago

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