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Naresh Mehta Hindi kavita Vrakshatva

इरशाद

हठात् विशाखा हवा आयी और फूलों का एक गुच्छ मुझ पर झर उठा - नरेश मेहता

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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माधवी के नीचे बैठा था
कि हठात् विशाखा हवा आयी
और फूलों का एक गुच्छ
मुझ पर झर उठा;
माधवी का यह वृक्षत्व
मुझे आकण्ठ सुगंधित कर गया ।

उस दिन
एक भिखारी ने भीख के लिए ही तो गुहारा था
और मैंने द्वाराचार में उसे क्या दिया ?-
उपेक्षा, तिरस्कार
और शायद ढेर से अपशब्द ।
मेरे वृक्षत्व के इन फूलों ने
निश्चय ही उसे कुछ तो किया ही होगा,
पर सुगंधित तो नहीं की ।

सबका अपना-अपना वृक्षत्व है ।


साभार - कविताकोश 
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