आपका शहर Close
Hindi News ›   Kavya ›   Irshaad ›   Nabakanta Barua poem ret in hindi
Nabakanta Barua poem ret in hindi

इरशाद

नवकांत बरुआ: ढाक कीे अाग बुझ चुकी अब

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

194 Views

रेत
ढाक कीे अाग बुझ चुकी अब,
शाल और सप्तपर्णी के वनों में
मान शासन की विगत वैशाखी आंधियों से
कितने-कितने सपने झड़ गए,
किसने रखा हिसाब?
कपिली, कलङ्, दिजू के तटों पर
पितामह की अस्थियां, 
पितामही के कलेजे से उपजे 
वन नहरू के फूल
क्या कहा था बादल ने, दान करो, दे डालो सब,
रास्तों के किनारे पेड़ लगाओ
एक हाई स्कूल खोलो, पथिक भला लगता हैै
पथ पर सदा, एकाध निःश्वास ले लो बस,
आने दो वर्षा का जल छत को फोड़कर,
बहा ले जाए मकड़ों के खोखले शव।
बाढ़ की रेत हैं हम, बनें उपजाऊ भूमि अब,
पौत्रों-दौहित्रों के नए खेतों पर
हल चलने की आवाज हमें जगाए।
हंसाए उन्हें हमारे जीवाश्मों में लिखे
आख्यान उन लोगों के,
बीते जन्मों की बातें जिन्हें याद थीं।
सपनों की जिन अन्धी गलियों में होंगे हम,
उन्हीं के परिवाह में होगा भविष्य।

अनुवाद : शिव किशोर तिवारी

सर्वाधिक पढ़े गए
Top

Other Properties:

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।

Agree
Your Story has been saved!