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Mohammad sharfuddin sahil nazm arzoo

इरशाद

अम्न पसंद इंसान की 'आरज़ू' है यह नज़्म

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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ख़ुदाया आरज़ू मेरी यही है
ये हसरत दिल में करवट ले रही है
बनूं कमज़ोर लोगों का सहारा
दुखी लोगों को दूं हर दम दिलासा
ज़ईफ़ों बे-कसों के काम आऊं
ग़रीबों मुफ़लिसों के काम आऊं
मैं अपने दोस्तों का दुख उठाऊं
जो रूठे हों उन्हें हंस कर मनाऊं
बुराई से सदा लड़ता रहूं मैं
भला हर काम ही करता रहूं मैं
हमेशा अलम से रख्खूं में उल्फ़त
किताबों से सदा रख्खूं मोहब्बत
जो भटके हों उन्हें मंज़िल दिखाऊं
जो अंधे हों उन्हें रस्ता बताऊं
करूं मां बाप की दिल से मैं ख़िदमत
रखूं उस्ताद से अपने मोहब्बत
बुज़ुर्गों की नसीहत पर करूं मैं
मैं नफ़रत के चराग़ों को बुझाऊं
दिया अम्न ओ मोहब्बत का जलाऊं
करूं अपने वतन की पासबानी
अता करना मुझे वो नौजवानी
ख़ुदाया आरज़ू कर दे ये पूरी
यही बस इल्तिजा है तुझ से मेरी
-  मोहम्मद शरफ़ुद्दीन साहिल


साभार - रेख़्ता 

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