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mohammad alvi ghazal har ik jhonka nukeela ho gaya hai

इरशाद

अभी दो चार ही बूंदें गिरीं हैं, मगर मौसम नशीला हो गया है - मोहम्मद अल्वी

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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हर इक झोंका नुकीला हो गया है
फ़ज़ा का रंग नीला हो गया है

अभी दो चार ही बूंदें गिरीं हैं
मगर मौसम नशीला हो गया है

करें क्या दिल उसी को मांगता है
ये साला भी हटीला हो गया है

ख़बर क्या थी कि नेकी बांझ होगी
बदी का तो क़बीला हो गया है

ख़ुदा रक्खे जवानी आ गई है
गुनह बांका-सजीला हो गया है

न जाने छत पे क्या देखा था 'अल्वी'
बेचारा चांद पीला हो है

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