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Laxmi Shankar Bajpai hindi kavita bheed ka sailab

इरशाद

कुछ नारे उसे हांक कर भीड़ में ले गए... पढ़ें कविता 'भीड़ का सैलाब'

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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अच्छा-भला आदमी था
सीधा-सादा, बाल-बच्चेदार, घर-गृहस्थ
कुछ नारे उसे हांक कर भीड़ में ले गए
और उसे भी क्या सूझी
कि अचानक आदमी से
‘भीड़’ में बदल गया
और भीड़ का सैलाब थमने के बाद
उसने पाया अपने आप को
एक अस्पताल के मुर्दाघर में
अपने पहचाने जाने का इंतज़ार करते हुए
- लक्ष्मीशंकर वाजपेयी



साभार- कविताकोश 

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