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krishna bihari noor ghazal rang laya na kabhi barge hina mere baad

इरशाद

रंग लाया न कभी बर्गे-हिना मेरे बाद - कृष्णबिहारी नूर

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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रंग लाया न कभी बर्गे-हिना मेरे बाद
उस हथेली पे कोई गुल न खिला मेरे बाद

उसने यूं ही नहीं छोड़ी है जफ़ा मेरे बाद
तीर ही कोई न तरकश में बचा मेरे बाद

आइना दिल का मेरे होते हुए कर लो साफ़
यूं भी उड़ा जाएगी ये गर्दे-अना मेरे बाद

मैंने जब छोड़ दी दुनिया तो अकेला ही रहा 
कौन देता मेरे होने का पता मेरे बाद

कूचए-यार की बातें मैं किया करता था
अब अगर आती तो क्या पाती सबा मेरे बाद

जिस्म होता तो नज़र आता भी मैं भी, वो भी
साथ रहता है मेरे मेरा ख़ुदा मेरे बाद

परवरिश जिसकी जहां होती है रहता है वहीं
किसके घर जाएगा सैलाबे-बला मेरे बाद

नूर बस इतना ही महसूस हुआ ये जाना
फ़र्क होने का न होने का मिटा मेरे बाद 
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