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इक ग़ज़ल उस पे लिखूं दिल का तक़ाजा है बहुत: कृष्ण बिहारी नूर

इरशाद

इक ग़ज़ल उस पे लिखूं दिल का तक़ाजा है बहुत: कृष्ण बिहारी नूर 

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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इक ग़ज़ल उस पे लिखूं दिल का तक़ाजा है बहुत
इन दिनों ख़ुद से बिछड़ जाने का धड़का है बहुत 

रात हो दिन हो ग़फ़लत हो कि बेदारी हो
उसको देखा तो नहीं है उसे सोचा है बहुत 

तश्नगी के भी मुक़ामात हैं क्या क्या यानी 
कभी दरिया नहीं काफ़ी, कभी क़तरा है बहुत 

मेरे हाथों की लकीरों के इज़ाफ़े हैं गवाह 
मैंने पत्थर की तरह ख़ुद को तराशा है बहुत 

कोई आया है ज़रूर और यहां टहरा भी है 
घर की दहलीज़ पे ऐ 'नूर' उजाला है बहुत 
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