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khwabon ki hansi ghazal of poet hariom

इरशाद

यह है ‘ख़्वाबों की हंसी’ से कवि हरिओम की बेहतरीन ग़ज़ल...

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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सूने दिन मेरी रातों से कहते हैं
ख़्वाब तुम्हारे अब आंखों में रहते हैं

किसका ग़म है मंज़र सूना-सूना है
किसकी चाहत में ये आंसू बहते हैं

बिछड़े सब रफ़्ता-रफ़्ता, बारी-बारी
हम तन्हाई के आलम में रहते हैं

तुझसे मिलना एक पुरानी बात हुई 
मुद्द्त से फ़ुरकत के सदमे सहते हैं

इश्क़ ने तेरे मुझको मालामाल किया
मोती हैं ये आंखों से जो बहते हैं

दिल में दरिया दर्द का उमड़ा आता है
दुख के परबत जैसे रह-रह ढहते हैं

साभार- ख़्वाबों की हंसी 
वाणी प्रकाशन
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