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केदारनाथ सिंह

इरशाद

वे क्यों भागे जाते हैं जिनके घर है: केदारनाथ सिंह 

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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बिजली चमकी, पानी गिरने का डर है
वे क्यों भागे जाते हैं जिनके घर है

वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा
वह क्या है जो दिखता है धुँआ-धुआँ-सा

वह क्या है हरा-हरा-सा जिसके आगे
हैं उलझ गए जीने के सारे धागे

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