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कलीम आजिज़ की ग़ज़ल: किस नाज़ किस अंदाज़ से तुम हाए चलो हो 

इरशाद

कलीम आजिज़ की ग़ज़ल: किस नाज़ किस अंदाज़ से तुम हाए चलो हो 

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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किस नाज़ किस अंदाज़ से तुम हाए चलो हो 
रोज़ एक ग़ज़ल हम से कहलवाए चलो हो 

रखना है कहीं पाँव तो रक्खो हो कहीं पाँव 
चलना ज़रा आया है तो इतराए चलो हो 

मय में कोई ख़ामी है न साग़र में कोई खोट 
पीना नहीं आए है तो छलकाए चलो हो 

हम कुछ नहीं कहते हैं कोई कुछ नहीं कहता 
तुम क्या हो तुम्हीं सब से कहलवाए चलो हो 
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