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Kaifi azmi nazm pyar ka jashn

इरशाद

कैफ़ी आज़मी की ख़ूबसूरत नज़्म 'प्यार का जश्न'

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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प्यार का जश्न नयी तरह मनाना होगा
ग़म किसी दिल में सही ग़म को मिटाना होगा

काँपते होंटों पे पैमान-ए-वफ़ा क्या कहना
तुझ को लायी है कहाँ लग़्ज़िश-ए-पा1 क्या कहना   1. पैरों की लड़खड़ाहट
मेरे घर में तिरे मुखड़े की ज़िया2 क्या कहना          2. ज्योति
आज हर घर का दिया मुझ को जलाना होगा

रूह चेहरों पे धुआँ देख के शर्माती है
झेंपी झेंपी सी मिरे लब पे हँसी आती है
तेरे मिलने की ख़ुशी दर्द बनी जाती है
हमको हँसना है तो औरों को हँसाना होगा

सोई-सोई हुई आँखों में छलकते हुए जाम
खोई खोई हुई नज़रों में मोहब्बत का पयाम3       3. सन्देश
लब-ए-शीरीं पे मिरी तिश्नालबी4 का इनआम       4.प्यास
जाने इनआम मिलेगा कि चुराना होगा

मेरी गर्दन में तिरी सन्दली बाँहों का ये हार
अभी आँसू थे इन आँखों में अभी इतना ख़ुमार
मैं न कहता था मिरे घर में भी आएगी बहार
शर्त इतनी थी कि पहले तुझे आना होगा


साभार- कैफ़ियात
राजकमल प्रकाशन 

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