आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Irshaad ›   jigar moradabadi ghazal dil gaya raunak e hayat gayi
jigar moradabadi ghazal dil gaya raunak e hayat gayi

इरशाद

जिगर मुरादाबादी की ग़ज़ल 'दिल गया रौनक-ए-हयात गई'

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

475 Views

दिल गया रौनक़-ए-हयात गई
ग़म गया सारी कायनात गई

दिल धड़कते ही फिर गई वो नज़र
लब तक आई न थी कि बात गई

दिन का क्या ज़िक्र तीरा-बख़्तों में
एक रात आई एक रात गई

तेरी बातों से आज तो वाइज़
वो जो थी ख़्वाहिश-ए-नजात गई

उन के बहलाए भी न बहला दिल
राएगां सई-ए-इल्तिफ़ात गई

मर्ग-ए-आशिक़ तो कुछ नहीं लेकिन
इक मसीहा-नफ़स की बात गई

अब जुनूं आप है गरेबां-गीर
अब वो रस्म-ए-तकल्लुफ़ात गई

तर्क-ए-उल्फ़त बहुत बजा नासेह
लेकिन उस तक अगर ये बात गई

हां मज़े लूट ले जवानी के
फिर न आएगी ये जो रात गई

हां ये सरशारिया जवानी की
आंख झपकी ही थी कि रात गई

नहीं मिलता मिज़ाज-ए-दिल हम से
ग़ालिबन दूर तक ये बात गई

क़ैद-ए-हस्ती से कब नजात 'जिगर'
मौत आई अगर हयात गई

सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!