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जां निसार अख्तर

इरशाद

जां निसार अख़्तर की नज़्म ‘महकती हुई रात’

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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यह तेरे प्यार की ख़ुशबू से महकती हुई रात
अपने सीने में छुपाए तेरे दिल की धड़कन 
आज फिर तेरी अदा से मेरे पास आई है

अपनी आंखों में तेरी ज़ुल्फ़ का डाले काजल
अपनी पलकों पे सजाए हुए अरमानों के ख़्वाब
अपने आंचल पे तमन्ना के सितारे टांके

गुनगुनाती हुई यादों की लवें जाग उठीं
कितने गुज़रे हुए लम्हों के चमकते जुगनू
दिल को हाले में लिए कांप रहे हैं कब से

कितने लम्हे जो तेरी ज़ुल्फ़ के साये के तले
ग़र्क़ होकर तेरी आंखों के हसीं सागर में
ग़मे दौरां से बहुत दूर गुज़ारे मैंने

कितने लम्हे कि तेरी प्यार भरी नज़रों ने
किस सलीके से सजाई मेरे दिल की महफ़िल
किस क़रीने से सिखाया मुझे जीने का शऊर

कितने लम्हे कि हसीं नर्म सुबुक आंचल से 
तूने बढ़कर मेरे माथे का पसीना पोंछा
चांदनी बन गयी राहों की कड़ी धूप मुझे

कितने लम्हे कि ग़मे-ज़ीस्त के तूफ़ानों में
ज़िंदगानी की जलाए हुए बाग़ी मशअल
तू मेरा अज़्मे-जवां बन के मेरे साथ रही

कितने लम्हे कि ग़मे-दिल से उभरकर हमने
इक नई सुब्हे-मुहब्बत की लगन अपनाई
सारी दुनिया के लिए सारे ज़माने के लिए

इन्हीं लम्हों के गुलआवेज़ शरारों का तुझे
गूंधकर आज कोई हार पहना दू्ं आ जा
चूमकर मांग तेरी तुझको सजा दूं आ जा
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