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Jaafar sahni ghazal eid ka din to hai magar jaafar

इरशाद

ईद का दिन तो है मगर 'जाफ़र', मैं अकेले तो हँस नहीं सकता - जाफ़र साहनी

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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मैं यहां शोर किस लिए करता

धर लिया जाऊंगा ये इम्कां था


देखिए रुख़ हवा का कब ठहरे
आ गया ले के वो दिया जलता

पेड़ पौधे तो ख़ौफ़ खाते हैं
घास पर उस का बस नहीं चलता

उड़ गया आख़िरश मैं कमरे से
कब तिलक जीते-जी यहां मरता

मेरे अंदर जो ढूंढता था मुझे
उस से कट कर मैं मिल चुका कब का

ख़्वाब दे कर ये फूल लाया हूं
कहिए महंगा मिला है या सस्ता

ईद का दिन तो है मगर 'जाफ़र'
मैं अकेले तो हंस नहीं सकता

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