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Hasan Akbar Kamal nazm hansi khanakti hui bujhi bujhi khushiyan

इरशाद

हंसी खनकती हुई या बुझी-बुझी ख़ुशियां - हसन अकबर कमाल की नज़्म

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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हंसी खनकती हुई या बुझी-बुझी ख़ुशियां
हैं दोस्ती की महक से रची हुई घड़ियां

मज़ा अनोखा सा है आते-जाते लमहों में
किताबें गोद में फैलीं हैं खोए बातों में

रफ़ाक़तों में ख़ज़ाना क्यूं हमने पाया है
न दिल पे बोझ है कोई ना ग़म का साया है

हमें ये धुन है कि ख़ुश्बू को हम तो देखेंगे
यक़ीन है कि सितारों को बढ़ के छू लेगें

खुला ये राज़ बिछड़ना भी था बहारों को
किसी के हाथ नहीं छू सके सितारों को 

कभी दरीचों में शम्मे जो हम जलाते हैं
तो गीत लहजे ख़्यालों में गुनगुनाते हैं 
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