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habib jalib nazm sach hi likhte jana

इरशाद

देना पड़े कुछ ही हर्जाना सच ही लिखते जाना - हबीब जालिब

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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देना पड़े कुछ ही हर्जाना सच ही लिखते जाना
मत घबराना मत डर जाना सच ही लिखते जाना

बातिल की मुंह-ज़ोर हवा से जो न कभी बुझ पाएं
वो शमएँ रौशन कर जाना सच ही लिखते जाना

पल दो पल के ऐश की ख़ातिर क्या देना क्या झुकना
आख़िर सब को है मर जाना सच ही लिखते जाना

लौह-ए-जहां पर नाम तुम्हारा लिखा रहेगा यूं ही
'जालिब' सच का दम भर जाना सच ही लिखते जाना

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