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गोरख पांडेय: बंद खिड़कियों से टकरा कर गिर पड़ी है वह

इरशाद

गोरख पांडेय: बंद खिड़कियों से टकरा कर गिर पड़ी है वह...

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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घर-घर में दीवारें हैं
दीवारों में बंद खिड़कियाँ हैं
बंद खिड़कियों से टकराकर अपना सर
लहूलुहान गिर पड़ी है वह

नई बहू है, घर की लक्ष्मी है
इनके सपनों की रानी है
कुल की इज्ज़त है
आधी दुनिया है
जहाँ अर्चना होती उसकी
वहाँ देवता रमते हैं
वह सीता है, सावित्री है
वह जननी है
स्वर्गादपि गरीयसी है आगे पढ़ें

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