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ghazal nazm on lord ram

इरशाद

गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल हैं 'राम' पर लिखी ग़ज़लें और नज़्में, मसलन...

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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इसे ज़फ़र अली ख़ां ने लिखा है। 

न तो नाक़ूस से है और न असनाम से है
हिंद की गर्मि-ए-हंगामा तिरे नाम से है

(न ही शंख से है और न ही मूर्तियों से है। हिंद में धूमधाम तुम्हारे नाम से है)

मैं तिरे शेव:-ए-तसलीम पे सर धुनता हूं
कि यह इक दूर की निसबत तुझे इस्लाम से है

(तुम्हें अपनी आज्ञाकारिता के कारण कितने कष्ट उठाने पढ़े थे)

हो वो छोटों की इताअत कि बड़ों की शफ़क़त
ज़िंदा दोनों की हक़ीक़त तिरे पैगान से है

(तुमसे छोटों के लिए वात्सल्य और बड़ों का आज्ञापालन दोनों सीखे जा सकते हैं)

तेरी तालीम हुई नज़्रे-ख़ुराफ़ाते-फ़िरंग
बिरहमन को यह गिला गर्दिशे-अय्याम से है

(हमारी शिक्षा तो अंग्रेज़ों के झूठ की भेंट चढ़ गयी जिस बात की शिकायत समय को भी है)

नक़्शे-तहज़ीबे-हुनूद अब भी नुमायां है अगर
तो वो सीता से है, लक्ष्मण से है और राम से है

(सभ्यता के निशान अगर अब भी हैं तो वह सीता, लक्ष्मण और राम से हैं)



साभार- हिन्दोस्तां हमारा
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