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धूमिल की कविता-मुर्गे की बांग पर सूरज को टांगकर...कविता नहीं काव्यात्मक टिप्पणी है

इरशाद

समाज को आईना दिखाती धूमिल की कविता-मुर्गे की बांग पर सूरज को टांगकर...

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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धूमिल मात्र अनुभूति के कवि नहीं, विचार के कवि हैं। उनके यहां अनुभूतिपरकता और विचारशीलता, इतिहास और समझ, एक दूसरे से घुले-मिले हैं। उनकी कविता भावात्मक स्तर पर ही नहीं बल्कि बौद्धिक स्तर पर भी सक्रिय रहती है।

मुर्गे की बांग पर
सूरज को टांगकर
सो जाओ हत्याओं के खिलाफ
ओढ़कर
निकम्मी आदतों का लिहाफ।

क्योंकि यही वक्त है जबकि सिरहाने
घड़ी के अलार्म का टूटा हुआ होना भी-
एक अदद सुविधा है।
वर्ना तुम कर भी क्या सकते हो
वर्ना तुम कर भी क्या सकते हो
यदि पड़ोस की महिला का एक बटन
तुम्हारी बीवी के ब्लाउज से
(कीमत में ) बड़ा है
और प्यार करने से पहले
तुम्हें पेट की आग से होकर गुजरना पड़ा है। आगे पढ़ें

फिर भी तुम चाहो तो यह करो

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