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दाग देहलवी: रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी... 

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी 
आप से तुम तुम से तू होने लगी 

चाहिए पैग़ाम-बर दोनों तरफ़ 
लुत्फ़ क्या जब दू-ब-दू[2] होने लगी 

मेरी रुस्वाई की नौबत आ गई 
उन की शोहरत कू-ब-कू[3] होने लगी 

है तेरी तस्वीर कितनी बे-हिजाब 
हर किसी के रू-ब-रू होने लगी 

ग़ैर के होते भला ऐ शाम-ए-वस्ल[4] 
क्यूं हमारे रू-ब-रू होने लगी 

ना-उम्मीदी बढ़ गई है इस क़दर 
आरज़ू की आरज़ू होने लगी 

अब के मिल कर देखिए क्या रंग हो 
फिर हमारी जुस्तुजू होने लगी 

'दाग़' इतराए हुए फिरते हैं आज 
शायद उन की आबरू होने लगी 



1.संदेशवाहक, दूत, प्रतिनिधि 2.दो एक साथ, किसी तीसरे के बिना 3.मिलन की शाम 4.हर जगह


 
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