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chandrakant devtale poetry adrashya hone ke baad bhi

इरशाद

चन्द्रकान्त देवताले: अदृश्य होने के बाद भी...

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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जैसे गुज़र जाने के बाद भी
पुरखे बुदबुदाते रहते हैं हिदायतें
और हमें सुनायी भी देती है उनकी आवाज़
जो कई बार आँसुओं की बूंदों की तरह
रिसती है हमारी नींद तक में

इसी तरह कुछ कवि आग की लपटों में अदृश्य
या धरती में दफ़्न होने के बाद भी 
मंडराते रहते हैं चुनौती की तरह
और लिखते रहते हैं कविताएं

उनके शब्दों के बीच हमेशा रहती है जगह छूटी हुई इतनी
जिसमें धरती के घट्टी पींसने की आवाज़ के साथ
शैतान की मण्डी और हत्यारों के
ख़ैरात बांटते मुखौटों के ख़िलाफ़
निरन्तर बजती रहती हैं ख़तरे की घण्टियां…
चेतावनी हमारी ज़ुबानों को करण्ट मारती

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