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दाग़ देहलवी

इरशाद

भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं: दाग़ देहलवी

अमर उजाला, काव्यडेस्क, नई दिल्ली

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भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं 
किसी से आज बिगड़ी है कि वो यूँ बन के बैठे हैं 

दिलों पर सैकड़ों सिक्के तेरे जोबन के बैठे हैं 
कलेजों पर हज़ारों तीर उस चितवन के बैठे हैं 

इलाही क्यूँ नहीं उठती क़यामत माजरा क्या है 
हमारे सामने पहलू में वो दुश्मन के बैठे हैं  आगे पढ़ें

अभी फिर रूठ जाएँगे

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