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मैथिलीशरण गुप्त

इरशाद

तेरे घर के द्वार बहुत हैं, किसमें हो कर आऊं मैं: मैथिलीशरण गुप्त

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?
सब द्वारों पर भीड़ मची है,
कैसे भीतर आऊं मैं?

द्वारपाल भय दिखलाते हैं,
कुछ ही जन जाने पाते हैं,
शेष सभी धक्के खाते हैं,
क्यों कर घुसने पाऊं मैं?
तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं? आगे पढ़ें

तेरी विभव कल्पना कर के

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