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Anwar jalalpuri ghazal chandani mein raat bhar saara jahan achcha laga

इरशाद

अनवर जलालपुरी की ग़ज़ल 'चांदनी में रात भर सारा जहां अच्छा लगा'

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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चांदनी में रात भर सारा जहां अच्छा लगा
धूप जब फैली तो अपना ही मकां अच्छा लगा

अब तो ये एहसास भी बाक़ी नहीं है दोस्तों
किस जगह हम मुज़महिल थे और कहां अच्छा लगा

आके अब ठहरे हुये पानी से दिलचस्पी हुई
एक मुद्दत तक हमें आबे रवां अच्छा लगा

लुट गये जब रास्ते में जाके तब आंखे खुली
पहले तो एख़लाक़-ए-मीर कारवां अच्छा लगा

जब हक़ीक़त सामने आई तो हैरत में पड़े
मुद्दतों हम को भी हुस्ने दास्तां अच्छा लगा

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