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ahmed faraz ghazal dost ban kar bhi nahin sath nibhane wala

इरशाद

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला - अहमद फ़राज़

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला
वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला

अब उसे लोग समझते हैं गिरफ़्तार मिरा
सख़्त नादिम है मुझे दाम में लाने वाला

सुब्ह-दम छोड़ गया निकहत-ए-गुल की सूरत
रात को ग़ुंचा-ए-दिल में सिमट आने वाला

क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उस से
वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला

तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया
आज तन्हा हूं तो कोई नहीं आने वाला

मुंतज़िर किस का हूं टूटी हुई दहलीज़ पे मैं
कौन आएगा यहां कौन है आने वाला

क्या ख़बर थी जो मिरी जां में घुला है इतना
है वही मुझ को सर-ए-दार भी लाने वाला

मैं ने देखा है बहारों में चमन को जलते
है कोई ख़्वाब की ताबीर बताने वाला

तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो 'फ़राज़'
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला
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