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अदम गोंडवी

इरशाद

पहले जनाब कोई शिगूफ़ा उछाल दो: अदम गोंडवी

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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पहले जनाब कोई शिगूफ़ा उछाल दो 
फिर कर का बोझ कि गर्दन पर डाल दो 

रिश्वत को हक़ समझ के जहाँ ले रहे हों लोग 
है और कोई मुल्क तो उसकी मिसाल दो 

औरत तुम्हारे पांव की जूती की तरह है 
जब बोरियत महसूस हो घर से निकाल दो 

चीनी नहीं है घर में लो मेहमान आ गए 
महंगाई की भट्ठी में शराफ़त उबाल दो 
 
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