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सात खंडों में प्रकाशित हिंदी साहित्य ज्ञानकोश शुक्रवार को महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भेंट किया गया।

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हिंदी का पहला विश्वकोश: सात खंडों में प्रकाशित हुआ हिंदी साहित्य ज्ञानकोश

अमर उजाला काव्य डेस्क

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भारतीय भाषा परिषद् कोलकाता और वाणी प्रकाशन के संयुक्त प्रयासों से हिंदी भाषा का पहला साहित्य ज्ञानकोश हिंदी पाठकों के सामने है। सात खंडों में प्रकाशित हिंदी साहित्य ज्ञानकोश शुक्रवार को महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भेंट किया गया।

राष्ट्रपति भवन में भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष  कुसुम खेमानी, वाणी प्रकाशन के प्रबंधन निदेशक अरुण माहेश्वरी और ग्रंथ के प्रधान संपादक शंभुनाथ के शिष्टमंडल ने देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति कोविंद को यह हिंदी का ऐतिहासिक ग्रंथ भेंट किया। 

हिंदी साहित्य ज्ञानकोश को हिंदी के पहले विश्वकोश के रूप में भी देखा जा रहा है। साहित्य ज्ञानकोश के प्रधान संपादक और ओलाचक शंभुनाथ के मुताबिक हिंदी साहित्य ज्ञानकोश हिंदी की सांस्कृतिक गरिमा का जयघोष है। यह हिंदी की दुनिया को समृद्ध करेगा।

बता दें कि हिंदी साहित्य ज्ञानकोश के प्रधान संपादक वरिष्ठ आलोचक और विद्वान शंभुनाथ हैं जबकि संपादक मंडल में राधावल्लभ त्रिपाठी, जवरीमल्ल पारख, अवधेश प्रधान, अवधेश कुमार सिंह, अवधेश प्रसाद सिंह हैं। कोश की भाषा का संपादन वरिष्ठ लेखक राजकिशोर ने किया है जबकि संयोजन भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष डॉ. कुसुम खेमानी ने किया है।

हिंदी का सबसे वृहद, पहला और समृद्ध ज्ञानकोश 
हिंदी साहित्य ज्ञानकोश के प्रधान संपादक शंभुनाथ ने अमर उजाला को बताया की इसे हिंदी का पहला विश्वकोश कह सकते हैं। हालांकि बांग्ला अनुदित हिंदी विश्वकोश 1916 से 1926 के बीच 24 खंडों में प्रकाशित हुआ था लेकिन वैसा बन नहीं पाया। इसे अन्य भारतीय भाषाओं में लाने की योजना थी लेकिन वह भी संभव नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त पहले डॉ. धीरेंद्र वर्मा द्वारा साठ के दशक में भी एक साहित्य कोश बनाया गया था और 60 वर्षों बाद यह दूसरा लेकिन आधुनिक ज्ञानकोश है।

हिंदी साहित्य, दर्शन, इतिहास, आलोचना आदि सभी विषयों को समाहित किए हुए यह सात खण्डों का महती ज्ञानकोश हिंदी साहित्य में पहला ऐसा प्रयास है जो शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों, शिक्षकों के अतिरिक्त आम पाठकों के लिए भी उतना ही लाभप्रद है।

शुंभनाथ के मुताबिक हिंदी साहित्य ज्ञानकोश साहित्य के विद्यार्थियों के लिए ही नहीं, उन सभी पाठकों और जिज्ञासुओं के लिए एक धरोहर है जो धर्म, संस्कृति, समाज-विज्ञान, मीडिया, कला-साहित्य, पर्यावरण आदि विषयों के साथ अपने देश और विश्व की सभ्यताओं को समझना चाहते हैं। 



वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी ने बताया कि हिंदी साहित्य ज्ञानकोश को तैयार करने में हर भाषा के विशेषज्ञ के तौर पर तकरीबन 300 लेखकों की 2600 से ऊपर प्रविष्ठियां शामिल की गई हैं और यह साहित्य कोश 7 खंडों और 4589 पृष्ठों में है।

अरुण माहेश्वरी के मुताबिक इस साहित्यकोश में ज्ञान के विविध क्षेत्रों से संबंधित प्रविष्टियां हैं जो अब तक किसी विश्वकोश में नहीं हैं। वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी और भारतीय भाषा परिषद की डॉ. कुसुम खेमानी ने बताया कि यह कोश हिंदी समाज और भाषा को एक उपहार है और किसी भी तरह के लाभ-हानि से परे हिंदी समाज को समृद्ध करने और उसे उसकी प्रामाणिक पहचान देने की ओर बढ़ाया गया कदम है। अरुण  माहेश्वरी ने बताया कि जल्द ही यह साहित्य ज्ञानकोश डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध होगा। 

क्यों पड़ी हिंदी साहित्य ज्ञानकोश की जरूरत?  
साहित्य ज्ञानकोश के प्रधान संपादक शंभुनाथ के मुताबिक अब जबकि इस दुनिया में पिछले 50 सालों में ज्ञान के कई विस्फोट हुए हैं तो ऐसे में हिंदी भाषा की जरूरत है वह उस ज्ञान और उसके शब्दकोश को अपने भीतर समाहित करे और हिंदी भाषी समाज तक पहुंचाए। एक तरह से यह नए ज्ञान की नई रोशनी में भारतीय भाषाओं में हिंदी में बना यह पहला ज्ञानकोश है। 

शंभुनाथ के मुताबिक हिंदी साहित्य ज्ञानकोश का इस्तेमाल सहज ढंग से किया जा सकता है। इसके सातों खंड खुली खिड़कियों की तरह हैं। इन्हें अकारादि क्रम से देखा जा सकता है। इसके अलावा, पाठक विषयवार खंडों से अपनी रुचि और जरूरत के अनुसार प्रविष्टियां चुनकर पढ़ सकते हैं।

यह ज्ञानकोश साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अध्ययन की बनी चहारदीवारियों को तोड़ता है और पाठक को जीवंत बनाए रखता है। अतीत और पश्चिम से आच्छादित हुए बिना आलोचनात्मक समावेशिकता ही हिंदी साहित्य ज्ञानकोश के निर्माण की बुनियादी दृष्टि रही है।
 
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