ज़ियाउल हक़ क़ासमी की हास्य नज़्म: मैं शिकार हूँ किसी और का मुझे मारता कोई और है

राजेंद्र राजन का गीत: मौसम में पुरवाई जैसे
                
                                                             
                            मैं शिकार हूँ किसी और का मुझे मारता कोई और है 
                                                                     
                            
मुझे जिस ने बकरी बना दिया वो तो भेड़िया कोई और है 

कई सर्दियाँ भी गुज़र गईं मैं तो उस के काम न आ सका 
मैं लिहाफ़ हूँ किसी और का मुझे ओढ़ता कोई और है 

मुझे चक्करों में फँसा दिया मुझे इश्क़ ने तो रुला दिया 
मैं तो माँग थी किसी और की मुझे माँगता कोई और है 

मैं टंगा रहा था मुंडेर पर कि कभी तो आएगा सेहन में 
मैं था मुंतज़िर किसी और का मुझे घूरता कोई और है  आगे पढ़ें

1 month ago

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