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रावण

हास्य

हास्यः रावण और आज के नेता

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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लोग
ऐसी बात कर रहे हैं
हमारे नेता आजकल 
रावण को भी मात कर रहे हैं
ये बात उड़ते-उड़ते
रावण तक पहुंची तो रावण बौखला गया
अपने से भी बड़े राक्षसों के दर्शन करने
वो लंकापति, वो दशानन
अानन-फानन में
सीधे दिल्ली आ गया 

स्टेशन से बाहर आते-आते 
घटना घट चुकी थी
टैक्सी करने के लिए 
पैसे नहीं बचे थे
अगले की जेब कट चुकी थी

निराश, मायूस लंकेश
चेहरे पे उदासी
मन में क्लेश लिए वो 
मुझसे टकराया, बोला-
भाई साब, आप भारतीयों के 
हाथ जोड़ते हैं
आप की तरक्की देखकर तो
हम भी शरमा गए, 
त्रेता में नाक काटने से चले थे 
कलियुग में जेब काटने पर आ गए

वो तो भला हो 
मंदोदरी का 
सौ का नोट अलग से 
अंटी में फंसा दिया था
वरना खाने के पैसे भी नहीं बचते 
मुझे तो मरवा दिया था

मुझे क्या पता था
सीता को चुराकर 
राम का दिल दुखाने के 
मुझे ये फल भोगने पड़ेंगे
कि मैं फलों को तरस जाऊंगा
मेरी समझ में नहीं आ रहा 
इन बचे हुए सौ रुपयों में
मैं क्या खाना खाऊंंगा ?

मैंने कहा- 
राम को क्यों इल्जाम दे रहे हैं
राम को सताने वाले तो मजे ले रहे हैं
वो त्रेता होगा
जहां राम को सताने पर 
मातम-पुर्सी मिलती है
ये कलियुग है रावण डार्लिंग!
यहां राम को सताओगे 
तो कुर्सी मिलती हैै

और रही बात खाना खाने की 
तो चिंंता मत कर 
सामने ढाबे में 
सत्तर-अस्सी रुपये में 
बहुत बढ़िया थामंली मिल जाएगी
जा, मैं तेरा यहीं इंतजार कर रहा हूं
पहले खाना खा कर आ

रावण ढाबे में गया, और 
जब रावण बाहर आया तो 
अगले के कपड़े और मुंह
दोनों उतरे हुए थे, 
मैंने कहा- 
क्यों रावण, 
कपड़े क्यों उतार लिए ?
बोला- 
उतार लिए नहीं, उतरवा लिए
मैंने कहा-
तुम्हारे पास तो सौ रुपये थे
सुनकर रावण रुआंसा हो गया
पर किसी तरह अपने आंसू रोक लिए
बोला- मैं क्या करता
अगले ने सत्तर रुपये पर हैड के हिसाब से 
सात सौ ठोंक दिए

पर अब मुझे कोई गिला नहीं है
अब मैं यही सोच कर नहीं रोता
जिन नेताओं के दर्शन करने के चक्कर में 
मेरा ये हाल हो गया 
अगर सच में उनके दर्शन हो जाते तो
मेरा क्या हाल होता ?

(साभारः हास्य-व्यंग्य की शिखर कविताएं, संकलनः अरुण जैमिनी, प्रकाशनः राधाकृष्ण प्रकाशन)
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