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काका की फुलझड़ियां- क्या बंद तुम्हारी आंखों में

हास्य

काका की फुलझड़ियां- क्या बंद तुम्हारी आंखों में... 

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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मृगनयनी बोलो, मुंह खोलो, क्या बंद तुम्हारी आंखों में ?
आनंद तुम्हारी आंखों में, द्वंद्व तुम्हारी आंखों में 

नयनों से पलक उठेंगे जब, वह आलम कैसा होगा तब
चमकें लाखों सूरज चंदा, हरचंद तुम्हारी आंखों में 

भंवरे क्यों भटके भन्नाएं, जब एक जगह ही पा जाएं 
गुलशन के सारे फूलों का, मकरंद तुम्हारी आंखों में  आगे पढ़ें

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