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हास्य

भूख, महंगाई, ग़रीबी इश्क़ तीनों मुझ पर मर रहीं थीं: हुल्लड़ मुरादाबादी 

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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क्या बताएं आपसे हम हाथ मलते रह गए
गीत सूखे पर लिखे थे, बाढ़ में सब बह गए

भूख, महंगाई, ग़रीबी इश्क़ मुझसे कर रहीं थीं
एक होती तो निभाता, तीनों मुझपर मर रहीं थीं
मच्छर, खटमल और चूहे घर मेरे मेहमान थे
मैं भी भूखा और भूखे ये मेरे भगवान थे आगे पढ़ें

रात को कुछ चोर आए, सोचकर चकरा गए

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