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एक से दस तक

हास्य

हास्यः एक से दस तक

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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भरे-भरे शहर के 
सुनसान चौराहे पर
खड़े थे आदमी तीन
एक, दो और तीन

एक ने दो से कहा- 'देख लूंगा'
दो ने एक से कहा- 
'देख लियो'
तीन उन को देख रहा था

उसने तुरंत चार से जाकर कहा -
'चार! मेरे दोस्त, मेरे यार
एक था बेचारा
दो ने बेचारे के थप्पड़ मारा'

चार ने पांच से जाकर कहा- 
'एक और दो में हो गई कहा-सुनी
दोनों ने एक दूसरे की कमर 
बड़ी तबीयत से धुनी'

पांच ने छः से जा कर कहा-
'एक ने दो के गोली मारी
दो ने एक के गोली मारी
वहां खड़े तीन, चार, पांच, छः
घायल हो गए

मैं वहीं से भागा-भागा आ रहा हूं
सबके हालात 
अपनी आंखों से देख कर आ रहा हूं'
और दोस्तों! आठ की आंखों में 
एक विशेष चमक आई
उसने नौ से सिर्फ इतना कहा- 
'एक हिंदू था
दो मुसलमान'

इस बात पर शहर का एक-एकक मकान
मकान न रहा 
बस बन गया था कान...

नौ ने दस को देखा
देखते ही देखते आदमी नंगा हो गया
शहर-भर में सांप्रदायिक दंगा हो गया!

(हास्य व्यंग्य की शिखर कविताएं से साभार)
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