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घनश्याम अग्रवाल

हास्य

महंगाई और महबूबा : घनश्याम अग्रवाल 

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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प्रिये 
चढ़ते हुए भावों से 
तेरे ये तेवर 
कोयले-सी जलती हुई 
तेरी आंखें 
चावलों से खिले दातों पर 
चीनी-सी सफेदी 
एक प्याज-सा 
माथे पर रखा बोरला 
हल्दी की गांठ-से 
तेरे ये होंठ 
पहाड़ी आलू-सी 
तेरी ये नाक 
वनस्पति घी के डिब्बे से 
गोल गोल चेहरे पर 
उड़द की दाल-से 
ये चेचक के दाग 
लालटेन-सी लटकती हुई 
तेरी ये गर्दन 
और उसमें से 
मिट्टी के तेल-सा 
टपकता हुआ पसीना 
ओ हसीना !
तू सचमुच मेरी जान है 
चलती-फिरती 
एक राशन की दुकान है! 

साभार : हास्य व्यंग्य की शिखर कविताएं, अरुण जैमिनी (राधाकृष्ण पेपरबैक) 
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