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हास्य

" भूगोल की परीक्षा "

Anil Pachori

11 कविताएं

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भूगोल परीक्षा थी उस दिन,
में भीतर से कांप गया
आने वाले भीषण परिणामों को
में उस पल में ही भांप गया

रात कटी ऐसे मेरी
चिंता रात्रि को चाट गयी
बस यही कमी थी उस पल में
जो एक बिल्ली रस्ता काट गयी

उत्तर थे जो मैंने याद किये
वो तो आधे ही याद हुए
उनमे से भी कुछ उत्तर तो
विद्यालय जाते अवसाद हुए

प्रवेश किया विद्यालय में
चपराशि मुझ पर चिल्लाया
ओ पागल जल्दी भाग उधर
तू देरी से है क्यों आया ?

कक्षा में घुसते ही मुझपर
मास्टरजी क्रोधित हो चिल्लाये
जा बैठ उधर उस नंबर पर
उठा हाथ वो बरबस झल्लाए

प्रश्न पत्र जब हाथ लगा
भूगोल ही पूरा गोल हुआ
उत्तर तब क्यों रटे नहीं मैंने ?
अब में फटा हुआ एक ढोल हुआ

क्यों पूछे गए वो ही सवाल ?
उत्तर जिनके मैंने थे रटे नहीं
हे प्रश्न रचियता महानुभाव
ऐसा करते तेरे भुज कटे नहीं

नेत्र बंद किये मैंने अपने
हाथों को संग में ले आया
हे कृष्ण, मदद करो मेरी
प्रश्न रचियता को दूसाशन बतलाया

अब समझ द्रोपती मुझको तुम
मेरा भी चीर बढा जाओ
प्रश्नो का उत्तर ना आता मुझको
जरा उत्तर तो बतला जाओ

तब चक्रधर बोले मुझसे
तू कर्म निर्भय हो करता जा
फल की इच्छा बिलकुल ना कर
जो ठीक लगे वो लिखता जा

प्रश्न पढ़ा मैंने फिर एक
उत्तर, मानचित्र पर दिखलाना था
काले सफ़ेद उस मानचित्र पर
भारत की सीमा को बतलाना था

मैंने भी ले तीनो रंग
उस मानचित्र को रंग दिए
पुरे के पुरे मानचित्र को
भारत माता के अंग कहे

मैंने तो एक अनसुलझा मुद्दा
उस मानचित्र में ही सुलझाया
अलग गए उस टुकड़े को
केशरिया रंग का ही बतलाया

फिर एक टिप्पणी लिखकर मैं,
परीक्षक को भी चेताया आया
उत्तर के गलत बताने पर
उसे भारत का दोषी बतलाया

प्रश्न किये मैंने सभी ख़तम
फिर भी एक पन्ना बचा लिया
उस बचे आखिरी पन्ने को
मैंने जन गण मन से सजा दिया

भारत माता की जय लिख कर
मैंने भूगोल था पूर्ण किया
इस तरह परीक्षा को उस दिन
हो निर्भय मैंने सम्पूर्ण किया

ऐसे ही हिम्मत कर करके
मैंने प्रश्नों का तोड़ किया
प्रश्नों पर मेरे उत्तर ने
प्रश्नो के रुख को मोड़ दिया
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अनिल पचौरी


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