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साहित्य जगत: साहित्यकारों ने की ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को नए संदर्भ में शुरू करने की अपील

अशोक वाजपेयी और गीतांजलि श्री
                
                                                                                 
                            

सरकार एक तरफ आजादी का अमृत महोत्सव मना रही है, दूसरी तरफ तमाम साहित्यकार भारत छोड़ो के नारे को नए संदर्भों में पेश कर रहे हैं। जाने माने कवि और लेखक अशोक वाजपेयी, बुकर पुरस्कार से सम्मानित गीतांजलि श्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित मृदुला गर्ग, इतिहासकार मृदुला मुखर्जी और कई साहित्यकारों ने कहा है कि जो लोग बात-बात पर पाकिस्तान भेजने की बात करते हैं, उनके खिलाफ आज ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ चलाने की जरूरत है।  

दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में नौ अगस्त के एतिहासिक भारत छोड़ो आंदोलन और शिवपूजन सहाय की स्मृति में हुए कार्यक्रम में अशोक वाजपेयी ने देश पर मंडराते खतरे की बात कही और चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इस वक्त लोकतंत्र ही नहीं पूरी भारतीय सभ्यता खतरे में है। हमारी सभ्यता और संस्कृति हजारों साल पुरानी है, पांच हजार सालों का हमारी सभ्यता का इतिहास है, इस सभ्यता और संस्कृति ने कुछ मूल्य विकसित किए थे, आज सब ध्वस्त हो रहे हैं। मौजूदा सत्ता हर क्षेत्र में घुसपैठ कर रही है और इस वजह से हमारी सभ्यता, संस्कृति और लोकतंत्र पर संकट मंडरा रहा है। उन्होंने कहा कि जिस तरह आजादी के आंदोलन के दौरान भारत छोड़ो का नारा दिया गया और उस बड़े आंदोलन की वजह से देश आजाद हुआ, आज भी हमें जिस तरह गुलामी की जंजीरों में जकड़ने की कोशिश हो रही है, ऐसे में उसी तरह के भारत छोड़ो आंदोलन की जरूरत है। इसके लिए जनता को आगे आना होगा।

गीतांजलि श्री ने भी अपनी पीड़ा का इजहार किया और आगरा में उन्हें एक कार्यक्रम में जाने से रोकने का मुद्दा उठाया। उन्होंने मौजूदा सत्ता पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस देश में आए दिन महिलाओं की भावनाएं आहत की जाती हैं, पाठकों की संवेदनाएं आहत होती हैं, ऐसे में भला उनकी पुरस्कृत किताब रेत समाधि पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप कैसे लगाया जा सकता है। 31 जुलाई को आगरा में रंगलीला संस्था की ओर से होने वाले साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान गीतांजलि श्री को वहां जाने से इस तर्क के साथ रोक दिया गया था कि उनके जाने से और रेत समाधि पर चर्चा करने से धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती थीं। इसका देशभर के तमाम साहित्यकारों ने विरोध किया था। आखिरकार उनका दौरा और वह कार्यक्रम ही रद्द करना पड़ा।

रज़ा फाउंडेशन और ‘स्त्री दर्पण’ पत्रिका की ओर से आयोजित इस समारोह में वक्ताओं ने यह भी कहा कि आजादी की लड़ाई में महिलाओं ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था और आज महिलाओं की मुक्ति के बिना आज़ादी का कोई मतलब नहीं है। समारोह में नेहरू खानदान की रामेश्वरी नेहरू द्वारा 1909 में शुरू की गई पत्रिका ‘स्त्री दर्पण’ के नए अंक का लोकार्पण भी किया गया। इस पत्रिका के संपादक वरिष्ठ पत्रकार कवि अरविंद कुमार और इग्नू में प्रोफेसर सविता सिंह हैं।

करीब पांच दशक से साहित्य में सक्रिय मृदुला गर्ग ने कहा कि इस संकट के लिए हम भी थोड़ा बहुत जिम्मेदार हैं क्योंकि तानाशाह को हमने चुना है। हर तानाशाह इतिहास में पिछले तानाशाहों के अंत से कुछ नहीं सीखता और खुद को भूतो न भविष्यति मानता है। उन्होंने कहा कि वह बचपन से गांधी जी की प्रार्थना सभाओं में जाती रहीं और अब सब कुछ बदल गया है। हमे आज भारत छोड़ो आंदोलन फिर शुरू करना होगा और अपने ही लोगों से कहना होगा तुम भारत छोड़ो तभी बात बनेगी।

नेहरू पुस्तकालय और संग्रहालय की पूर्व निदेशक इतिहासकार मृदुला मुखर्जी ने कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन में महिलाओं ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था। शुरू में तो यह आंदोलन स्कूली कालेज छात्राओं का था। उन्होंने 42 के आंदोलन में जेपी के अलावा अरुणा आसफ अली को हीरो बताते हुए कहा कि अंग्रेज भूमिगत रहने वाली अरुणा आसफ अली को पकड़ नहीं पाए थे और गांधीजी की अपील के बाद ही वह भूमिगत जीवन से बाहर आयीं।

उन्होंने हंसा मेहता का जिक्र भी किया जो 18 साल की उम्र में आज़ादी की लड़ाई में कूद पड़ीं और कांग्रेस रेडियो चलाती थीं जिस पर लोहिया के भाषण अधिक होते थे। डॉक्टर गरिमा श्रीवास्तव और डॉक्टर सविता सिंह ने पितृसत्त्ता का जिक्र करते हुए स्त्रियों पर पुरुषों द्वारा लगाए गए तमाम बंदिशों के बारे में बताया और कहा कि स्त्रियों की मुक्ति के बिना आज़ादी का कोई अर्थ नहीं। समारोह का संचालन इंद्रप्रस्थ महिला कॉलेज की प्रोफेसर हर्ष बाला शर्मा ने किया।

इस समारोह के आयोजकों में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले और स्त्री दर्पण पत्रिका को पुनर्जीवित करने वाले कवि विमल कुमार ने इस अभियान को देशव्यापी बनाने और पत्रिका के जरिये एक नए पुनर्जागरण आंदोलन की बात कही।

1 month ago

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